उद्धरण - 491

लेकिन न जाने क्यों ऐसे मौकों पर बरबस याद आनेवाला ईश्वर मुझे एक बड़ा भारी भ्रमजाल लगता है। धारोंधार डुबता हुआ हर तरह से असहाय मनुष्य चाहे वह आजीवन अनीश्वरवादी ही क्यों न रहा हो कहते हैं कि जान बचाने की लालच में ईश्वर को अवश्य याद करता है। परन्तु आस्तिकों की इसी बात को हम अपने ढंग से क्यों न कहें कि असहाय डूबते मनुष्य की जूझती जीवनेच्छा उस नये चेतनास्तर को पाने के लिए प्रेरित होती है जिसके ज्ञान-प्रकाश में वह अपनी जान बचाने की सूझ भरी राह पा ले।

Comments

Popular posts from this blog

उद्धरण - 797

उद्धरण - 549