उद्धरण - 436

यही जिन्दगी का लुत्फ़ है। कल हमारा ज़माना था आज उनका है कल किसी और का होगा- यही जिन्दगी का लुत्फ़ है। अगर सारा आलम एक रंग में रंग जाय तो फिर मजा़ ही क्या रहा। हम भाई सोशलिज़म-वोशलिज़म क़तई नहीं मानते।

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