उद्धरण - 338

सच्चा प्यार चरित्रहीन नहीं है परन्तु उसका नित्य फैशन और स्वाद बदलने की आदत अवश्य घृणित है। स्त्री हो या पुरूष चरित्र को नष्ट करना अपनी मानवीय पहचान को नष्ट करना है।

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