उद्धरण - 496

ये प्रेम का नाता बड़ा अजब है। अपनी भौतिक मर्यादाओं भावनाओं तक ऊँचा उठना तो मेरी समझ में आता है। मगर जहाँ ये समस्त भावनाएँ एकमेव प्रेमभाव के रूप मे ही प्रकट हों, विकसित हों, जूझें और अपनी जूझ में हर बार छलाँग मारकर नयी दहाइयों तक अदम्य अबाध रूप से बिजली सी कौंधती हुई दौड़कर बढ़ती हों वहाँ उनकी शक्ति क्या कहूँ कुछ अजब अलौकिक हो जाती है।

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