उद्धरण - 568

बच्चों का गुस्सा, बच्चों का मान, बच्चों का अहं कितना छोटा और कितना निरीह होता है सबकुछ। फिर बंटी जो छाया की तरह चिपककर रहा है उसके साथ।

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