उद्धरण - 344
तुमको भेज तो दिया रात के बखत पर दादा बड़े घबड़ाए मन्दा कैसे-कैसे बिलबिलाए। कक्को ने बताया हमें रात-भर विलाप किया है दादा ने-सारा गाँव क्या असपेर-भर यही कहेगा कि सामर्थहीन और अविवेकी पंचमसिंह। रच्छा नहीं कर पाए मोंडी की। बचा नहीं पाए सोनपुरा की मातौन को। मुख दिखलाने जोग नहीं रहे हम।
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