उद्धरण - 359

कक्को ने समझाया कि कौन मानता है तुम्हारी सिच्छा-दीच्छा। अपने नैमधरम अपने मगज तक राखो। बहुत बन लिये बड़े अब छोटे-बड़े की मान-मरजाद कहाँ राखते हैं लोग? जे तो एक दिन होना ही था तुम कहाँ लों रोकते?

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