उद्धरण - 341

क्या किया जाय हमारे जीवन में परिस्थितियों के संयोग ही कुछ ऐसे बैठे हैं कि एक बेटे की यशोगाथा के साथ-साथ दूसरे बेटे की कलंकगाथा अमृत और विष के समान प्राणों में घुलती है।

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