उद्धरण - 475

लेकिन मुवक्किल की मुर्खता खाकर ही वकील ज़िन्दा रहता है, जनता की कमसमझी और तंगनज़री जीमकर ही नेता की भूख तृप्त होती है, मरीज की नादानी ही चिकित्सक का संतुलित आहार होता है और नौकरशाही के काफ्काई प्रपंच ही मेरा भी पुष्टिकर खाद्य था।

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