उद्धरण - 415

अब मैं रोहित की पत्नी नहीं, अपने पापा की बेटी थी। अब मेरी टाँगें नहीं थरथरा रही थीं। अब मेरी आंखों में आँसू नहीं थे। पापा के मज़बूत गद्दीदार हाथ के स्पर्श ने मुझमें जैसे थोड़ी सी शक्ति का संचार कर दिया हो।

Comments

Popular posts from this blog

उद्धरण - 797

उद्धरण - 549