उद्धरण - 526
ये सब हिन्दू मुसलमान ईसाईपन की जाति-महत्ता की बातों में विश्वास करनेवाले लोग ऐसे मालूम होते हैं जैसे जवानी में बचपन के कपड़े घसीट-घसीटकर पहने खड़े हों।….. काश कि एक दयानन्द मुसलमानों में भी पैदा हो जाता और तमाम मुल्ला-मौलवियों को जूते मार मारकर मिल्लते-मोमिनीन से निकाल बाहर करता।…… एक अकेला निहत्था मुसलमान लगभग आध घण्टे तक हिन्दुओं को उन्हीं के महल्ले में खड़ा होकर कहनी सुनाता रहा तब सब चुप रहे और अब उसके जाने के बाद मुसलमानों की निन्दा इस जोर-शोर से कह रहे हैं कि जैसे अपनी शेखियाँ बघार रहे हों!
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