उद्धरण - 556

अहं और गुस्से से भरे-भरे शकुन की लाई हुई चीजों को बिना देखे, बिना छुए एक ओर सरका देने उमड़ते आँसूओं को भीतर ही भीतर रोककर सूखी आँखों से मोटर में बैठकर विदा हो जाने की व्यथा बंटी से कहीं ज़्यादा शकुन की अपनी व्यथा है और ऐसी व्यथा जिसे कोई भी बाँट नहीं सकता।

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