उद्धरण - 353
क्या स्त्री इतनी हीन अछूत और गई गुजरी होती है कि उसकी वजह से पुरूष महानता से गिर कर अपराधी हो जाता है, क्या स्त्री की कोई भावना नहीं होती कोई विचार नहीं होते। उसके पास आत्म-सम्मान और विवेक नहीं होता? क्या वह किसी के आचरण के औचित्य को नहीं समझ सकती?
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