उद्धरण - 426

करूणा की अथाह गहराई में रमेश का दिल डूबा हुआ है। वह जी रहा है देख-सुन रहा है उसकी अनुभूतियाँ भी जाग रही है; लेकिन उसके भाव गूँगे हो रहे है उसकी चेतना पीड़ा-कुंठित और भय से जड़ीभूत है।

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