उद्धरण - 386

नारी के आक्रामक पौरुष ने उसके संकोच जड़े पौरुष को झटका दिया। जीवन में पहली बार उसे किसी नारी का एकांत साथ मिला था। पिछले कई वर्षों से मन में हिलोंरे लेती हुई प्रेम-कामना जो स्वयं आक्रामक होना चाहती थी जो किसी प्रेमिका के लाज-संकोच से लड़कर उसे जीतना चाहती थी अब तक एक बार भी अपना दाँव न पाकर इस समय स्वंय ही एक फाहशा औरत के हत्थे चढ़ी जा रही है। उसे अच्छा नहीं लग रहा मगर अच्छा भी लग रहा है।

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