उद्धरण - 512

जवानी यों ही अंधी होती है बहूजी फिर बुढा़पे में उठी हुई जवानी। महासत्यानाशी। साहब ने जो किया तो आपकी मट्टी-पलीद हुई और अब आप जो कर रहीं हैं इस बच्चे की मट्टी-पलीद होगी। चेहरा देखा है बच्चे का? कैसा निकल आया है जैसे रात-दिन घुलता रहता हो भीतर ही भीतर।

Comments

Popular posts from this blog

उद्धरण - 797

उद्धरण - 549