उद्धरण - 346
मैं यथार्थ की गति स्थूल से सूक्ष्म मानकर चलता हूँ- मेरी बिम्बध्वनियों या ध्वनिबिम्बों को अभिन्न अटूट तार अब तो अपनी बहिर्चेतना द्वारा बिना किसी प्रकार का श्रम कराये हुए ही मेरे पूर्वश्रम के अर्जित फलस्वरूप संस्कार बनकर बिम्बावलियों की स्वतः गति के साथ घुल-मिलकर एक हो गया है।
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