उद्धरण - 443

वह सिसकती हुई माँ के आँचल में सिमट गई। अपनेपन की गर्माहट समेटती रही। लगा कि कभी कोई क्लेश मन में हुआ ही नहीं। कुछ घटा ही नहीं अभी अभी जन्म हुआ है उसका। नई अक्षत है वह। पवित्र। गंगा के जल की तरह निर्मल।

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