उद्धरण - 548

कि मिठू हमारे सगे भाई ने हमें बेईमान सिद्व कर दिया। छली कपटी और ढोंगी बनाकर छोड़ा। गाँव में ही नहीं असपेर भर में। एरच से कालपी तक। श्यामली से झांसी तक। नहीं-नहीं मिठू दसों दिशाओं में आकाश से पाताल तक रूखे पेड़ों और नदी सागर तक पहाड़-पर्वत तक हमें तो लगता है कि धरती के हर कोने में पिट रही है हमारी बेईमानी की डुगडुगी कि पंचमसिंह आदमी इंसान नहीं डकैत है ठग है चोर-भड़िया है।

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