उद्धरण - 434
शादी-ब्याह की सबसे अच्छी उमिर होती है सोलह से बीस बरिस तक। इस उमिर के दुल्हा को ’बर’ कहते हैं। बर को देखकर सबका जी जुड़ा जाता है। दुल्हन का दिल भी उल्लास से भर जाता है।.....बीस-पच्चीस बरिस के दूल्हा में वह बात नहीं फिर भी कोई हरज नहीं। इस उमिर के दूल्हा को बर नहीं बरूल्ली कहते हैं। अब पच्चीस से आगे बढ़ो ए बच्चा। पच्चीस से तीस बरिस तक के दूल्हे का चेहरा रूढ़ होने लगता है। मूँछ के बाल कड़े हो जाते हैं। बोली भी रूखी और कड़कीली हो जाती है। इस उमिर के दूल्हा को बरनाठ कहते हैं। इसके आगे तीस से चालीस बरिस का दूल्हा होता है। इसे जरनाठ कहते हैं। इस उमिर में देह बोली-किसी में भी नरमाई नहीं रहती। चमड़ी एकदम मोटी हो जाती है। इस उमिर का दूल्हा बड़ा चालाक हो जाता है हमेशा अपने मतलब की बात सोचता है। रात-बिरात घुमक्कड़ी करने लगता है। कई चक्करों में रहता है ए बिटिया। बीवी से हराठी-मुराठी की तरह ब्यौहार करता है। हमेशा जली-कटी सुनाता है।
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