उद्धरण - 577
और सारे समाज में रहकर आप लोगों की बखानी हुई सारी नैतिकता के लबादे ओढ़कर बेचारा व्यक्ति कितना अकेला, कितना शून्य, कितना निरर्थक है! या तो वह समाज को स्वीकारे अथवा समाज उसका अस्तित्व ही नकार देगा। ये क्या खूब समाजवाद है कि जिसमें समाज तो आजाद है पर उसका व्यक्ति गुलाम। और जब व्यक्ति ही गुलाम है निज अस्तित्वहीन है तब समाज ही क्योंकर स्वतन्त्र हुआ।
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