उद्धरण - 449
मैं अब बड़ी होकर कह सकती हूँ कि स्त्री में बचपन से ही प्यार कूट कूट भरा होता है। सात फेरे के बाद उसका प्यार साकार होकर उमड़ पड़ता है उसके जीवन को सराबोर कर देता है। उसे कोई मिटा नहीं सकता। पत्नी के प्यार को गुलामी नहीं कहा जा सकता। वह एकाकी प्यार भी नहीं है। वह किसी भीख में नहीं मिलता।
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