उद्धरण - 572
मुझे कोई एतराज़ नहीं होगा। सच पूछो तो मैं ख़ुद अब यही चाहने लगी थी कि इसे तुम्हारे पास ही भेज दूँ। बहुत रख लिया। अब कम से कम मैं अपनी ज़िंदगी जिऊँ- एक परत पर उभरा और उससे भी भीतर की परत पर उभरा- अच्छा है तुम्हारे और मीरा के बीच में भी दरार पड़े हर दिन एक परेशानी हर दिन एक तूफ़ान
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