उद्धरण - 559

मेरी भगती कच्ची नहीं है बाबूजी। माया-मोह साले को छोड़ते कितनी देर लगती है मुझे। इस्तरी-बच्चों में धरा क्या है? सब अपने-अपने स्वारथ के कारन हमें घेरते हैं। अरे हम घिर जायँ तो मूरख नहीं तो सन्त। इस्तरी-बच्चों से मुक्ती पाने का नाम ही मोच्छ है। देखौ आज हमारे लच्छू ने रेस्टोरां खोला हम गये। पर उसके ठाठ देखके हमारे मन में माया-मोह न उपजा। मिठाई खाई और संत-सम्मेलन में आ गये। यही तो मोच्छ है।

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