उद्धरण - 384
क्या अर्थ है इसका? कागज पर बनाया चित्र सजीव मनुष्य लगता है और सजीव सक्रिय मामूली गरीब युवती किसी कलाकार के चित्र की तरह! सौन्दर्य कहाँ है? उस युवती में या चित्र में? अथवा कलाकार में चाहे वह मनुष्य हो या ईश्वर ? या वह स्वंय उनके अन्दर है। यदि ऐसी ही बात है तो इतना ताप क्यो ? कब से यह आग है उनके अन्दर ? क्या कामनाओं की वह सुप्त आग ही सौन्दर्य है जो किसी खास अवसर पर जलने लगती है।
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