उद्धरण - 448
मन्दा मौत को ढकेलकर जीवन की चाह जोड़ रहे हैं दाऊ जू। जाने हमारी पिरीत में बल है कि उनके विसवास में हौसला जमराज अभी तक तो दूर खड़ा है बिन्नू वे बीमार और हम अधमरे बदहवास उसी कोंठा में उसी खटिया पर हरस-खुसी सुख-सुरग आनन्द-मंगल लेकर जी रहे हैं।
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