उद्धरण - 357

भीतर ही भीतर चलनेवाली एक अजीब ही लड़ाई थी वह भी जिसमें दम साधकर दोनों ने हर दिन प्रतीक्षा की थी कि कब सामनेवाले की साँस उखड़ जाती है और वह घुटने टेक देता है जिससे कि फिर वह बड़ी उदारता और क्षमाशीलता के साथ उसके सारे गुनाह माफ करके उसे स्वीकार कर ले उसके संपूर्ण व्यक्तित्व को निरे एक शून्य में बदलकर।

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