उद्धरण - 478

समझाया है दादा! भरोसा भी दिया है। सोचता हूँ कि अब जाने भी दो। कल को कोई बात हो गई तो आपके सिर कलंक कका जू का कोप अलग। घर की एकता ही टूट गई तो क्या रह जाएगा हमारा परिवार?

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