उद्धरण - 401

वह कहता है कि व्यभिचार की वृत्ति मोक्षदायिनी है क्योंकि दोनों पक्षों में किसी की कोई ज़िम्मेदारी उसमें नहीं रहती। व्यभिचार एक ऐसा जंगल है जिसके ओर-छोर पर कहीं भी भूत या भविष्य का लगाव नहीं होता। वह केवल वर्तमान में होता है। पुरूष केवल अपने देह-सुख के स्वार्थवश ही होता है और स्त्री अपने सुख-स्वार्थ के वश में। दोनों अपने-आपमें स्वतन्त्र होते हैं।

Comments

Popular posts from this blog

उद्धरण - 797

उद्धरण - 549