उद्धरण - 501

जो प्रेमी नहीं वे अपने स्वार्थ को छोड़कर और कुछ नहीं जानते। वे अपने ही अर्थ-साधन में लीन रहते हैं परन्तु जो प्रेमी हैं वे परहित साधन में अपनी हड्डियाँ तक अर्पित करने को तत्पर रहते हैं।

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