उद्धरण - 355
पार्टी के दिन समझ में आ गया कि यह किस क़दर असंभव है। पापा ने अपने निर्णय आप लिये थे और मुझे भी यही सिखाया था कि तुम्हें अपने निर्णय स्वंय लेने चहिए। ….समाजशास्त्र में एम ए करने का निर्णय भी मेरा ही था और रोहित से शादी करने मेरा ही था। यह सही था कि मुझे मेरे निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी गयी थी। लेकिन इस बात की कोई शर्त नहीं थी कि मेरे द्वारा लिये गये हर निर्णय को पसन्द भी किया ही जाएगा। न यह कि परिणामों के प्रति खबरदार भी किया जाएगा।
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