उद्धरण - 508
कुछ भी नहीं बस ऐसे ही रोने को मन हो रहा है। होता है न कुसुमा भाभी कभी-कभी ऐसे ही रो लेने का मन हो आता है।.....बिन्नू हमें न भरमाओं। मन्दा सब जानते हैं हम। दुख जब लबालब भर जाता है तो छलकता है बिटिया ऐसे ही नहीं आता रोना। यादों की आँच से भीतर भरी टीसें हो जाती है पानी-पानी।
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