उद्धरण - 445

मैं परंपरापोषित परिस्थितिपुत्र यही मानता था कि आदमी कमाकर लाता है और औरत उड़ाती है आदमी खटता है और औरत खिलाती है, आदमी जुटाता है औरत बनाती है, आदमी पाता है औरत पालती है, आदमी चलाता है औरत चलती है, इसी तरह की होती है दुनिया।

Comments

Popular posts from this blog

उद्धरण - 797

उद्धरण - 549