मैं परंपरापोषित परिस्थितिपुत्र यही मानता था कि आदमी कमाकर लाता है और औरत उड़ाती है आदमी खटता है और औरत खिलाती है, आदमी जुटाता है औरत बनाती है, आदमी पाता है औरत पालती है, आदमी चलाता है औरत चलती है, इसी तरह की होती है दुनिया।
तुम निजी इच्छाओं की पूर्ति और उससे प्राप्त क्षणिक सन्तोष तृप्ति को राष्ट्र, समाज और मनावता की सेवा से क्यों जोड़ते हो, एक में निजी प्रतिशोध का सुख है और दूसरे में मानव अस्तित्व की गरिमा का आनन्द। करोड़ों आम लोगों से जुड़ने की दिव्य अनुभूति! यह सही है कि तुम्हारे साथ बड़ा घृणित व्यवहार किया गया है लेकिन यह समझ लो कि यह सुलूक इसलिए नहीं हुआ कि तुम ऊँचे कुल में पैदा हुए हो, तुम ब्राह्मण हो उसका स्पष्ट कारण यह है कि तुम अपने देश की आजादी, देश के लोगों का कल्याण चाहते हो!
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