उद्धरण - 321
जीवन भर देश-प्रेम मानवता सत्य न्याय और ईमानदारी को ही भला समझता और समझाता रहा पर अब ये सब बातें निस्सार लगती हैं। इनसे न तो वह संसार ही बदला जिसे बदलने की भावना से मेरे मन में सदा उथल-पुथल मचाकर नये से नये विचार और कल्पनाएँ स्वतः स्फूर्त होती रहीं न मुझे सुख ही मिला।
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