उद्धरण - 890
साहित्यकार को निर्माण करके और लाभ भी तो क्या, रचयिता होने का सुख भी नहीं मिलता, क्योंकि काम पूरा होते ही वह देखता है, ‘अरे, यह तो वह नहीं है जो मैं बनाना चाहता था, वह मानों क्रियाशीलता का नारद है, उसे कहीं रुकना नहीं है -- उसे सर्वत्र भड़काना है, उभारना है, जलाना है और कभी शान्त नहीं होना है - कहीं रुकना नहीं है।
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