उद्धरण - 641

बार बार सोचे जाने के कारण इन हादसों की चमक खो उठती तो वह नयी विपत्तियों की रचना करने लगता था और तब उसके मनोलोक में गौरी किसी दूसरी दुर्घटना का शिकार होने लगती थी।

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