उद्धरण - 938

.....उस विस्तीर्ण, अत्यन्त निस्तब्ध रात में इस दृश्य को देखते हुए बोध की लहरें सी उसके शरीर में दौड़ने लगीं मानो वह इस जीवन के स्वप्न से उद्बुद्ध होकर किसी ऊँची यथार्थता के लोक में चला जा रहा है......उसे रोमांच हो आया। उसने आँखें मूँद लीं मानो आँखें मूँदकर ही वह इस दृश्य को बनाये रख सकता है, खुली आँखों के आगे वह छिन्न हो जाएगा।’

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