उद्धरण - 648

हो सकता है कि मेरा सोचना शुरू से ही गलत रहा हो- पर शुरू से वह यही रहा है। मेरे कर्म का- सामाजिक व्यवहार का नियमन समाज करे, ठीक है, मेरे अन्तरंग जीवन का- नहीं। वह मेरा है। मेरा यानी हर व्यक्ति का निजी।

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