उद्धरण - 950
......लेकिन जो बहुत सुन्दर है, वह भव्य, बहुत विशाल, बहुत पवित्र-इतना पवित्र कि शेखर को लगा कि वह उसके स्पर्श के योग्य नहीं है, वह मैला है, मल में आवृत है, छिपा हुआ है.......उसी सम्मोहन में उसने एक-एक करके अपने सब कपड़े उतार डाले, नीचे फेंक दिये और आँखें मूँदकर खड़ा हो गया, बिल्कुल नंगा, आकाश के सामने और उस पवित्र के, उस पवित्र से परिपूर्ण, उसके स्पर्श से रोमांचित।
Comments
Post a Comment