उद्धरण - 947
गौरैया, बुलबुल, कबतूर, मैना, तोता, कोयलें सामूहिक संहार के लिए कहीं इकट्ठा की जा रही हैं या वे सामूहिक ख़ुदकुशी के लिए किसी निर्जन स्थान में जमा हो रही हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि गर्मी में झुलस कर, जाड़े में ठिठुर कर या बरिश में भीग कर परिन्दों ने जान गंवा दी हो। क्योंकि बेघर परिन्दों के घोंसलों के लिए ब्रह्यांड में जगहें ख़त्म होती जा रही हैं। जब वृक्ष, उनकी शाखें, उनके पत्ते नहीं होंगे तो चिड़ियां चहकेंगी कहां, फुदकेंगी कहां और रहेंगी कहां?
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