उद्धरण - 620

आज के जीवन में पुरुष की ओर से देय कुछ भी नहीं है, सख्य तो दूर, करुणा भी देय नहीं रही, और नारी केवल पुरुष के उपभोग का साधन रह गई है, निरी सामग्री, जिसे वह जब चाहे, जैसे चाहे, जहाँ चाहे, अपनी तुष्टि के आग में होम कर दे। और इसकी कहीं अपील नहीं है, क्यांकि स्त्री कभी दुहाई दे तो उत्तर स्पष्ट है कि ‘और शादी की किसलिए जाती है?’

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