उद्धरण - 687

पिताजी की बात ठीक निकली। वे कहा करते थे कि दुख ही सुख की शक्ल ले सकता है, प्रेम ही नफरत की - ये सारे ‘विपरीत‘ समय के फेर से एक-दूसरे में बदल जाते हैं।

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