उद्धरण - 757

मनुष्य हो तो भीतर तक मनुष्य होगा। कलई वाला सदाचार यहाँ खुलकर उधड़ रहता है। यहाँ खरा कांच नहीं टिक सकता है, क्योंकि उसे जरूरत नहीं है कि वह कहे मैं पीतल नहीं हूँ।

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