उद्धरण - 664
कितना बड़ा है जीवन, कितना विस्तृत, कितना गहरा, कितना प्रवहमान, और उस में व्यक्ति की ये छोटी-छोटी इकाइयाँ-प्रवाह से अलग जो कोई अस्तित्व नहीं रखतीं, कोई अर्थ नहीं रखतीं, फिर भी सम्पूर्ण हैं, स्वायत्त हैं, अद्वितीय हैं, और स्वतःप्रमाण हैं, क्योंकि अन्ततोगत्वा आत्मानुशासित हैं, अपने आगे उत्तरदायी हैं।
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