उद्धरण - 965

वह उसकी सगी बहिन नहीं है। पर उस संबंध से उसे यदि कोई अन्तर जान पड़ता भी तो दूरी का नहीं, बल्कि और अधिक समीपत्व का, एक निर्बाध सखा-भाव का। वह भाव जैसे प्रातःकालीन शारदीय धूप की तरह है, जिसमें वह उस घर की ही नहीं, अपने अन्तर की भी छायाओं को सुला लेता है।

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