उद्धरण - 885

क्या यह कलाकार का दम्भ ही नहीं है कि वह पराजय को भी सुघर रूप देना चाहे! अन्त का सौन्दर्य उसकी सुचारुता में, सुघराई में नहीं है, करुणा में भी नहीं है, वह उसके अपरिहार्य अन्तिमपन और काठिन्य में है.......अन्त सुन्दर है क्योंकि वह महान है, क्योंकि हम उसका कुछ नहीं कर सकते, उसे केवल स्वीकार कर सकते हैं.......

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