उद्धरण - 869

उसने देख-समझ लिया-कि कोई किसी का नहीं है, यानी इतना नहीं है कि उसका स्वामी निर्देशक, भाग्य-विधायक बन सके। कोई ऐसा नहीं है जिस पर निर्भर किया जा सके, जिसे प्रत्येक बात में पूर्ण, अचूक माना जा सके। यदि किसी का कोई है, तो उसकी अपनी बुद्धि, मनुष्य को उसी के सहारे चलना है, उसी के सहारे जीना है, ऐसे स्थान अवश्य है जहाँ बुद्धि जवाब दे जाती है, लेकिन इसमें वह ईमानदारी है जो बात नहीं जानती, वहाँ पर चुप रहती है, गलत उत्तर नहीं देती।

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