उद्धरण - 918
हम लोग खूब बढ़िया इमारत बनाते हैं, एक एक पत्थर जोड़कर मन्दिर सजाते हैं, लेकिन अन्त में जब पलस्तर होने लगता है, तब सारा घटाघोप पैरों की धूल हो जाता है, मिट्टी में मिल जाता है.......यह क्यों, यह इसलिए कि हमारे आदर्श डर की भीत पर कायम हैं, हमारे विशाल भवनों की नींव खोखली है और जैसा कि शास्त्र भी कहते हैं, हमारे देवताओं के पैर भूमि पर नहीं टिकते हैं, समाज की सड़ती हुई हड्डियों को भड़कीले लाल रेशम में लपेटकर हम कहते हैं- देखो, हमारा युवक समुदाय....।
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