उद्धरण - 733

मैं आज इसी पर आश्चर्य किया करता हूँ कि ‘लोग क्या समझेंगे‘, इसका बोझ अपने ऊपर लेकर हम क्यों अपनी चाल को सीधा नहीं रखते हैं, क्यों उसे तिरछा-आड़ा बनाने की कोशिश करते हैं।

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