उद्धरण - 876

मानव-स्वभाव विश्वासी तो है ही। और जब विश्वासी है, तब पक्षपात लेकर चलता ही है। प्रिजुडाइस्ड होता ही है। तब क्यों न हम संसार को अच्छा ही समझ कर चलें? तर्कसिद्ध तो कोई भी बात नहीं है, पर एक से हम प्रसन्न तो रह सकते हैं, आराम से जी तो सकते हैं, हर वक्त बिस्तर पर तो नहीं पड़े रहते!

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